दिल्ली में उत्तराखंड की लेखिका डॉ. कविता पांडेय की पुस्तक ‘अदम्या-असीम की ओर’ पर साहित्यिक परिचर्चा, शब्दों की शक्ति और कहानी कहने की कला पर हुआ मंथन

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नई दिल्ली। साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, जीवन के अनुभवों और सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उत्तराखंड की लेखिका डॉ. कविता पांडेय की पुस्तक ‘अदम्या-असीम की ओर’ पर साहित्यिक परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता और राजनीतिक विश्लेषण से जुड़े वक्ताओं ने पुस्तक के विभिन्न पहलुओं के साथ शब्दों की शक्ति और कहानी कहने की कला पर अपने विचार रखे।

साहित्य और कहानी कहने की कला पर हुई चर्चा

परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि कहानी कहना केवल घटनाओं का क्रम प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि अनुभवों, भावनाओं और विचारों को इस तरह अभिव्यक्त करना है कि वे पाठक के मन में प्रभाव छोड़ सकें। भाषा की सहजता, कथ्य की गहराई और अभिव्यक्ति की प्रभावशीलता किसी भी साहित्यिक रचना को अर्थपूर्ण बनाती है।

वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि साहित्य पाठकों को केवल कहानी से परिचित नहीं कराता, बल्कि उन्हें अपने अनुभवों और दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने के लिए भी प्रेरित करता है।

शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने रखे विचार

कार्यक्रम में प्रख्यात शिक्षाविद् वी.एन. राय, वरिष्ठ खेल पत्रकार जी. राजारमण, लेखक महेश दर्पण, लेखिका एवं रचनाकार विजयश्री तनवीर तथा राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार संजय पांडेय ने सहभागिता की। इनके अलावा प्रवीण शेखर, डॉ. शिशिर सोमवंशी और चित्रा पंत भी कार्यक्रम में मौजूद रहे।

विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े वक्ताओं ने पुस्तक के कथ्य, भाषा, संवेदनात्मक पक्ष और रचनात्मक लेखन के प्रभाव पर विचार साझा किए। चर्चा में साहित्य की सामाजिक भूमिका और पाठकों के साथ उसके जुड़ाव को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

महेश दर्पण बोले- पाठकों को चौंकाता है अच्छा साहित्य

लेखक महेश दर्पण ने अपने संबोधन में कहा कि अच्छा साहित्य वह है, जो पाठकों को चौंकाता है। वहीं, वक्ता सिद्धेश्वर सिंह ने आदिवासी महिलाओं से जुड़ी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कई योजनाएं होने के बावजूद उनका लाभ जरूरतमंद महिलाओं तक नहीं पहुंच पाता।

इन विचारों के माध्यम से साहित्य, समाज और आम जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

शब्दों के माध्यम से बनता है लेखक और पाठक के बीच संवाद

परिचर्चा में यह विचार प्रमुखता से उभरा कि साहित्य की वास्तविक शक्ति उसकी संवाद स्थापित करने की क्षमता में निहित है। लेखक अपने अनुभवों और संवेदनाओं को शब्दों में पिरोता है और पाठक उन शब्दों में अपने जीवन के अनुभवों की झलक तलाशता है। यही जुड़ाव किसी साहित्यिक रचना को प्रभावशाली और यादगार बनाता है।

डॉ. कविता पांडेय की पुस्तक ‘अदम्या-असीम की ओर’ पर आयोजित यह परिचर्चा साहित्यिक संवाद और विचारों के आदान-प्रदान का मंच बनी। वक्ताओं ने रचनात्मक लेखन की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्य आज भी समाज को सोचने, समझने और नए दृष्टिकोण विकसित करने की प्रेरणा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


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