कैबिनेट बैठक में बिन्दुखत्ता राजस्व गांव का प्रस्ताव न आने से ग्रामीणों में गहरा आक्रोश, , बाहरी नेताओं पर ‘नेतागिरी’ के आरोप

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लालकुआं। बिन्दुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा देने की मांग को लेकर एक बार फिर माहौल गरमा गया है। 25 फरवरी को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में वन भूमि पर बसे इस क्षेत्र को राजस्व गांव का दर्जा देने का प्रस्ताव शामिल न होने से ग्रामीणों में गहरा आक्रोश फैल गया है। वर्षों से स्थायी समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हजारों परिवारों को एक बार फिर निराशा हाथ लगी है।

बिन्दुखत्ता की बसासत कई दशक पुरानी है। यहां हजारों लोग लंबे समय से रह रहे हैं, लेकिन वन भूमि का दर्जा होने के कारण उन्हें जमीन पर कानूनी अधिकार, नक्शा-खसरा, बैंक ऋण, निर्माण अनुमति और सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में भी यही दर्जा सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

राजस्व गांव का दर्जा मिलने से जमीन पर मालिकाना हक और विकास कार्यों को गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी। इसी मांग को लेकर 18 फरवरी को क्षेत्र में ऐतिहासिक जनसैलाब उमड़ा था। हजारों की संख्या में ग्रामीण सड़कों पर उतरे और सरकार से ठोस निर्णय लेने की मांग की। उस प्रदर्शन ने साफ संकेत दिया था कि अब लोग केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस और अंतिम समाधान चाहते हैं।

स्थानीय संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने उस समय भरोसा दिलाया था कि 25 फरवरी को राजस्व गांव का दर्जा देने का प्रस्ताव मंत्रिमंडल में लाया जाएगा। लेकिन 25 फरवरी की बैठक में प्रस्ताव शामिल न होने से मायूसी के साथ गुस्सा भी बढ़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि बार-बार आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन फाइल आगे नहीं बढ़ती।

इस बीच ग्रामीणों ने कुछ बाहरी नेताओं और राजनीतिक चेहरों पर आंदोलन के नाम पर नेतागिरी करने का आरोप भी लगाया है। उनका कहना है कि भीड़ जुटाकर मंच से बड़े-बड़े बयान देना आसान है, लेकिन सरकार पर दबाव बनाकर ठोस कार्रवाई कराना ही असली जिम्मेदारी है। बिन्दुखत्ता के मुद्दे को राजनीतिक मंच बनाने के बजाय समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास होने चाहिए।

क्षेत्र के बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी जमीन पर गुजार दी, लेकिन आज भी कानूनी मान्यता का इंतजार कर रहे हैं। युवा पीढ़ी इसे अपने भविष्य, रोजगार और संपत्ति अधिकारों से जुड़ा बड़ा सवाल मान रही है।

अब ग्रामीणों ने संकेत दिए हैं कि यदि जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं हुआ तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। बिन्दुखत्ता की यह लड़ाई केवल जमीन के कागजों की नहीं, बल्कि पहचान, अधिकार और सम्मान की भी है। आने वाले दिनों में सरकार और जनप्रतिनिधियों का रुख क्या रहता है, इस पर पूरे क्षेत्र की निगाहें टिकी हैं।