बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने की जंग तेज: वनाधिकार संगठन का बिगुल, 4-5 मई को अनशन और 6 मई को महाजनसभा का ऐलान

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लालकुआं। बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा दिलाने की मांग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। वर्षों से लंबित इस मुद्दे को लेकर अब वनाधिकार संगठन ने खुलकर मोर्चा संभाल लिया है और “जन-जन की सरकार, कब आएगी बिंदुखत्ता के द्वार” अभियान के तहत बड़ा जनआंदोलन छेड़ने का ऐलान कर दिया है।

नगर पंचायत सभागार में आयोजित पत्रकार वार्ता में संगठन के पदाधिकारियों ने साफ कहा कि अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि अधिकार चाहिए। उन्होंने बताया कि वनाधिकार कानून (FRA) के तहत राजस्व गांव बनाने की सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की जा चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद सरकार और प्रशासन की ओर से अब तक अधिसूचना जारी नहीं की गई है। इससे क्षेत्रवासियों में भारी नाराजगी है और अब आंदोलन ही एकमात्र रास्ता बचा है।

वनाधिकार संगठन के उमेश भट्ट, अर्जुन नाथ गोस्वामी, पूर्व कैप्टन इंदर सिंह पनेरी, बसंत पांडे समेत अन्य वक्ताओं ने कहा कि बिंदुखत्ता की हजारों की आबादी आज भी बुनियादी अधिकारों से वंचित है। राजस्व गांव का दर्जा न मिलने के कारण लोगों को जमीन, आवास, सड़क, पानी और अन्य सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

संगठन ने बताया कि 4 और 5 मई को बिंदुखत्ता स्थित शहीद स्मारक में दो दिवसीय क्रमिक अनशन और विचार गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को आमंत्रित किया जाएगा, ताकि वे जनता के बीच आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करें।

वक्ताओं ने कांग्रेस और भाजपा दोनों पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्षों से सत्ता में रहने के बावजूद किसी भी दल ने बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने के मुद्दे पर ठोस पहल नहीं की। अब जनता जवाब चाहती है कि आखिर अब तक क्या किया गया।

संगठन ने यह भी याद दिलाया कि 18 फरवरी को हुए ऐतिहासिक आंदोलन में करीब 15 हजार लोगों ने भाग लिया था और सरकार को दो महीने का अल्टीमेटम दिया गया था। अब वह समय सीमा पूरी हो चुकी है, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

ऐसे में 6 मई को एक विशाल जनसभा आयोजित कर आगे की रणनीति का ऐलान किया जाएगा। संगठन ने संकेत दिए हैं कि यदि इसके बाद भी मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।

वनाधिकार संगठन का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ बिंदुखत्ता के दर्जे की नहीं, बल्कि यहां के हर नागरिक के अधिकार, सम्मान और भविष्य की है। अब यह आंदोलन जनआक्रोश का रूप ले चुका है, जिसे नजरअंदाज करना शासन-प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा।
इस दौरान वन अधिकार संगठन के सभी प्राधिकारी मौजूद थे।