उत्तराखंड: सूखे मौसम के बीच राहत की उम्मीद, इस दिन से पहाड़ों में बदलेंगे हालात

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उत्तराखंड में लंबे समय से जारी शुष्क मौसम अब चिंता की वजह बनता जा रहा है। सर्दियों के मौसम में जहां बर्फबारी और बारिश सामान्य मानी जाती है, वहीं इस बार पहाड़ों से लेकर मैदानी इलाकों तक मौसम का असामान्य रुख देखने को मिल रहा है। हालांकि मौसम विभाग ने 22 जनवरी से कुछ पर्वतीय जिलों में हल्की बारिश और बर्फबारी के संकेत दिए हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बदलाव हालात सुधार पाएगा?

मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार 22 जनवरी से उत्तराखंड के कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम करवट ले सकता है। उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग के कुछ हिस्सों के साथ ही चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में कहीं-कहीं हल्की बारिश होने की संभावना जताई गई है। 3000 मीटर और उससे अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में हल्की बर्फबारी के आसार हैं, जबकि प्रदेश के अधिकांश मैदानी और अन्य जिलों में मौसम शुष्क ही बने रहने की उम्मीद है।

लगातार शुष्क मौसम ने पर्यावरण के साथ-साथ आम जनजीवन को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। बीते कई हफ्तों से बारिश और बर्फबारी न होने के कारण पहाड़ों में नमी की भारी कमी देखी जा रही है। बद्रीनाथ धाम और हेमकुंड साहिब जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में हुई हल्की बर्फबारी का असर बेहद सीमित रहा। वहीं देहरादून समेत मैदानी क्षेत्रों में तेज धूप के चलते दिन में गर्माहट महसूस की जा रही है, जिससे ठंड का असर कमजोर पड़ गया है और वायु गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है।

बर्फबारी न होने का सीधा असर उत्तराखंड के पर्यटन और ट्रैकिंग व्यवसाय पर साफ नजर आ रहा है। आमतौर पर दिसंबर तक औली, बेदनी बुग्याल और लोहाजंग जैसे इलाकों में बर्फ की सफेद चादर बिछ जाती है, लेकिन इस साल पहाड़ों की चोटियां सूनी दिखाई दे रही हैं। लोहाजंग क्षेत्र में ट्रैकिंग कंपनियों के बेस कैंप खाली पड़े हैं, जहां सामान्यतः सर्दियों में भारी चहल-पहल रहती थी।

पर्यटन आंकड़े भी हालात की गंभीरता बयां कर रहे हैं। पिछले वर्ष बर्फबारी के बाद लोहाजंग क्षेत्र में रोजाना 700 से 1000 पर्यटक पहुंच रहे थे, जबकि इस वर्ष 10 जनवरी तक मात्र 296 पर्यटक ही यहां पहुंचे हैं। इससे होटल, होमस्टे, गाइड और ट्रैकिंग से जुड़े स्थानीय कारोबारियों की आमदनी पर सीधा असर पड़ा है।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब पहाड़ों की पारिस्थितिकी पर भी साफ दिखने लगा है। आमतौर पर मार्च में खिलने वाला बुरांश इस बार जनवरी के मध्य से पहले ही खिल गया है। 1500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर उगने वाला यह फूल स्थानीय महिलाओं की आर्थिकी से जुड़ा हुआ है। समय से पहले खिलने से इसके उत्पादन, गुणवत्ता और रोजगार पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

अब सभी की निगाहें 22 जनवरी पर टिकी हैं। सवाल यही है कि क्या यह संभावित बारिश और बर्फबारी उत्तराखंड को शुष्कता से राहत दे पाएगी, या यह बदलाव भी केवल नाम मात्र का साबित होगा?